मां नंदा देवी राज जात यात्रा: इतिहास, पौराणिक कथा, पड़ाव, चौसिंघ्या खाडू और रहस्य

मां नंदा देवी राज जात यात्रा को हिमालय महाकुंभ कहा जाता है। यह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि उत्तराखंड की लोक आस्था, संस्कृति और भावनात्मक परंपरा का जीवंत रूप है। यह यात्रा हर 12 वर्षों में एक बार आयोजित होती है और इसे विश्व की सबसे लंबी व कठिन पैदल धार्मिक यात्राओं में गिना जाता है।

यह यात्रा उत्तराखंड के चमोली जिले के नौटी गांव से प्रारंभ होकर रूपकुंड होते हुए होमकुंड में संपन्न होती है। इस दौरान श्रद्धालु लगभग 280 किलोमीटर की दूरी नंगे पांव तय करते हैं।

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नंदा देवी राज जात यात्रा का ऐतिहासिक स्वरूप

इतिहासकारों के अनुसार, इस यात्रा की शुरुआत सातवीं शताब्दी में हुई थी।

प्रमुख ऐतिहासिक तथ्य:

  • राजा शालीपाल (चमोली-गढ़वाल) ने चांदपुर से यात्रा की शुरुआत की
  • यह वही काल था जब आदि गुरु शंकराचार्य ने भारत में चार पीठों की स्थापना की
  • नौवीं शताब्दी में राजा कनकपाल ने यात्रा को संगठित और भव्य रूप दिया
  • कंसुवा के कुंवर और नौटी के नौटियाल परिवार इस यात्रा के परंपरागत संरक्षक हैं

यात्रा का संचालन केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक व्यवस्था के अनुसार होता है, जिसमें 12 ठोकदार परिवारों की अहम भूमिका होती है।

मां नंदा देवी का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्र में मां नंदा देवी को ब्याही गई बेटी के रूप में पूजा जाता है। लोक मान्यता के अनुसार:

  • मां नंदा देवी, देवी पार्वती का ही रूप हैं
  • उनका जन्म हिमवान ऋषि और मेनावती के घर हुआ
  • विवाह भगवान शिव से हुआ
  • कैलाश को उनका ससुराल माना जाता है

स्थानीय लोगों के लिए कैलाश केवल तीर्थ नहीं, बल्कि बेटी का ससुराल है, जहां नंदा देवी को कठिन जीवन झेलना पड़ता है। इसी कारण हर 12 वर्षों में उन्हें मायके बुलाया जाता है और सम्मानपूर्वक ससुराल विदा किया जाता है।

👉 यही विदाई उत्सव नंदा देवी राज जात यात्रा कहलाता है।

गढ़वाल और कुमाऊं की सांस्कृतिक एकता का प्रतीक

मां नंदा देवी को राज राजेश्वरी देवी भी कहा जाता है। वे गढ़वाल और कुमाऊं दोनों क्षेत्रों की कुलदेवी हैं। यही कारण है कि यह यात्रा:

  • दोनों अंचलों की सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है
  • सामाजिक समरसता को दर्शाती है
  • गांव-गांव से छतोली, डोली और निशान यात्रा में शामिल होते हैं

चौसिंघ्या खाडू: यात्रा का सबसे रहस्यमय तत्व

चौसिंघ्या खाडू क्या है?

चौसिंघ्या खाडू चार सींगों वाला दुर्लभ भेड़ है, जो इस यात्रा का नेतृत्व करता है।

महत्वपूर्ण तथ्य:

  • 12 वर्षों में केवल एक बार जन्म
  • यात्रा से कुछ समय पहले ही जन्म लेता है
  • मां नंदा देवी का पवित्र वाहन माना जाता है
  • रंग-बिरंगे वस्त्रों और श्रृंगार सामग्री से सुसज्जित
  • अंत में होमकुंड के पास अदृश्य हो जाता है

लोक मान्यता है कि यह भेड़ भगवान शिव का रूप है, जो मां नंदा को वापस कैलाश ले जाने आता है।

👉 वर्ष 2026 की यात्रा के लिए चौसिंघ्या खाडू का जन्म कोटि गांव में हो चुका है, जिसे लोग दिव्य संकेत मानते हैं।

छतोली (Ringal Chhatoli) का धार्मिक महत्व

छतोली इस यात्रा की एक अनिवार्य परंपरा है।

  • रिंगाल (स्थानीय बांस) से बनी
  • पवित्र छाता/पालकी के समान संरचना
  • देवी के प्रतीक के रूप में उपयोग
  • कंसुवा के कुंवर परिवार द्वारा लायी जाती है
  • नौटी में यात्रा का शुभारंभ छतोली और खाडू की पूजा से होता है

नंदा देवी राज जात यात्रा की अवधि और ऊंचाई

विवरणजानकारी
कुल अवधि19–20 दिन
कुल दूरीलगभग 280 किमी
प्रारंभिक ऊंचाई13,000 फीट
अंतिम ऊंचाई17,500 फीट

नंदा देवी राज जात यात्रा के प्रमुख पड़ाव

प्रमुख पड़ाव स्थल (क्रमवार)

नौटी → ईड़ाबधाणी → कंसुवा → चांदपुर गढ़ी → सेम → दिलखानीधार → कोटि → कुलसारी → नंदकेसरी → फल्दिया → मुंडोली → वान → बेदनी बुग्याल → पतार नाचोनिया → रूपकुंड → शिलासमुद्र → होमकुंड

कुछ प्रमुख पड़ावों का विस्तार से वर्णन

पहला पड़ाव – नौटी गाँव

नौटी से प्रथम दिन राजजात  पहले पड़ाव एरा बदानी गावं पहुँचती हैं ! कैलाश यात्रा जाने से पहले  नंदा देवी एरा बदानी गावं आने के बारे में कहानी है कि एक बार ससुराल जाते समय उनकी नजर ईड़ाबधाणी गावं पर पड़ी  उन्हें यह गावं बहुत अच्छा  लगा  और वह वहां पंहुच गयी  यह वही स्थान है जहां जमन सिंह जडोरा नाम के व्यक्ति ने नंदा का आदर सत्कार किया नंदा देवी प्रसन्न हुयी जमन सिंह जडोरा ने नंदा देवी से प्रार्थना की  कि जब भी वे कैलाश की ओर जाएं, तो मेरा आतिथ्य अवश्य स्वीकार करें । तब से, हर राज जात सबसे पहले एरा बदानी पंहुचती है।

दूसरा पड़ाव- ईड़ाबधाणी
ईड़ाबधाणी से दूसरे दिन यात्रा वापस नौटी पहुंचती है। इस रात्रि नोटि मंदिर में रातभर जागरण होता है।   इसके बाद यात्रा कुवरों के मूल  गांव कांसुआ  पंहुचती है यहां नंदा देवी की स्थापना मंदिर के बजाय राज कुवरों के मूल घर में की गई है यहां स्थित भराड़ी चौक में चार सिंग के मेढे  और पवित्र छंतोली की पूजा -अर्चना की जाती  है। इसी गांव के राजकुंवरों पर नंदा राज जात के आयोजन की जिम्मेदारी होती है।  

तीसरा पड़ाव -कांसुवा
कांसुआ गांव की सीमा पर स्थित महादेव घाट,यहां पर महादेव मंदिर है। कांसुआ के सभी लोग यहां तक नंदा को विदा करने आते हैं। 

चौथा पड़ाव –चांदपुर गढ़ी 
पूरी यात्रा  में सर्वाधिक  भीड़ इसी स्थान   पर होती है। गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्र के यात्री बड़ी संख्या में दर्शनों के लिए पहुंचते हैं। यहां पर राजा के वंशजों द्वारा देवी की पूजा की परम्परा है।   

पांचवां पड़ाव- सेम
सेम गावं,  से धारकोट, घड़ियाल और सिमतोली में देवी की पूजा होती है। सितोलीधार इस स्थान के बाद नंदा का मायका नोटी नहीं दिखाई देता। विश्वाश है कि यहां पर नंदा बार-बार अपने मायके नोटी  लोटना चाहती है। 

छठा पड़ाव –दिलखानीधार 
यात्रा दर्शन  के लिए यहां पर स्थानीय लोगों की भीड़  एकत्र होती है यहां से नंदा देवी के ससुराल कैलाश पर नजर पड़ती है। एक विश्वाश इस धार के बारे में भी प्रचलित  है कि यहां पर देवी छुपती है यानि कि  ससुराल नहीं जाना चाहती । आगे जाने के लिए आना -कानी करती है । कहा जाता है यहां पर नंदा से  कोटिश प्रार्थना की गई इसलिए अगले पड़ाव का नाम कोटि पड़ा।

सातवां पड़ाव  – कोटि  गांव
कोटि  गांव कोटियाल रावतों  तथा उनके कुल पुरोहित डूडी  ब्राह्मणों  का मूल गांव  है रात में मंदिर में जागरण होता है। कोटि में  नंदा देवी  के दो मंदिर हैं लाटू व जीतू बगवाल का मंदिर। 
कोटि से भगोती के लिए प्रस्थान, घतोड़ा गांव (जिसे मालखेत भी कहा जाता है) इसी मार्ग पर स्थित एक स्थान है। इसके बारे में में किवदंती है कि मां नंदा देवी के पीछे दैत्य पड़े तो देवी ने अपने जय -विजय  नाम के दो गणों को प्रकट किया। गणों ने कला प्रदर्शन कर देत्यों  को भगा  दिया। भगोती मां नंदा के मायका (मातृ पक्ष) का अंतिम पड़ाव माना जाता है। भगवती नंदा के नाम से ही इस गांव का नाम भगोती  पड़ा ।  इस गाँव के ठीक नीचे क्युल गदेरा बहता  है, मान्यता है कि इस गधेरे  के बाद नंदा देवी का ससुराल क्षेत्र लग जाता है। भक्तों के लिए यह पड़ाव बहुत ही भावुक कर देने वाला होता  है। 

आठवां पड़ाव  – कुलसारी 
सुराल क्षेत्र का पहला पड़ाव कुलसारी यहां पर काली रूप में नंदा की पूजा की जाती है। इसलिए इस स्थान का नाम कुलसारी पड़ा । परंपरा  अनुसार यहां राजजात को अमावस्या के दिन पहुंचना होता  है। यहां पर काली यंत्र भूमिगत है । राजजात के अवसर पर ही इसे भूमि से निकालकर पूजे जाने का रिवाज है और  फिर अगली यात्रा तक भूमिगत कर दिया जाता है । 

कुलसारी के बाद यात्रा थराली होते हुए  चेपड्यूं गांव की ओर बढ़ती है। चेपड्यूं बुटोला थोकदारों का गांव है। यहीं पर हटवाल थोकदार भी रहते हैं।   

नौवां पड़ाव -नंदकेसरी
नंदकेसरी  चेपड़ो से, यात्रा विजयपुर, सेरा, बुडजौला, कल्याणी और चिंदिया गांवों से होते हुए नंदकेसरी तक जाती है। नंदकेसरी  में कुरुड़ बधाण की यात्रा एवं कुमाऊं से आने वाली यात्रा का मिलन होता है। यहां पर तीन यात्राओं का संगम होता है।  
 

कुरुड़- चमोली जिले के विकासनगर घाट में स्थित कुरुड़ को सिद्धपीठमाना जाता  है।   यहां पर  मां नंदा देवी की डोली दो रूपों में निवास करती है।  कुरुड़-बधाण और  कुरुड़-दशोली।  यहां से प्रतिवर्ष वार्षिक जात  भी जाती है।   

इतिहासकारों के अनुसार नंदकेशरी पड़ाव वर्ष 2000 की राजजात में  बना। इससे पहले  नंदकेशरी पड़ाव नहीं था 
इस स्थान का नाम नंदकेसरी पड़ने के पीछे  एक किवदंती प्रचलित है कि  एक बार नंदा कैलाश की और जा रही थी तो उनके केश यानि बाल सुराही के पेड़ पर उलझ गए  जिस कारण इस स्थान का नाम नंदकेसरी पड़ा। 
 
इस बीच यात्रा के दौरान कोट भ्रामरी नामक स्थान आता है। कोट भ्रामरी” वह स्थान है जहाँ देवी ने अरुण नामक दैत्य को मारने के लिए भौरों  का रूप धारण किया था, इसलिए वे यहाँ भ्रामरी देवी के नाम से जानी जाती हैं। 

दसवां पड़ाव – फल्दियागांव 
फिर यात्रा पूर्णा, हाट, कल्याणी, देवल और उनंगरा होते हुए फल्दिया गांव तक जाती है।पूर्णा गांव में आज भी गेहूं की फसल नहीं उगती। स्थानीय लोगों का मानना ​​है कि इसका कारण देवी द्वारा बहुत पहले दिया गया श्राप है। यह मान्यता ग्रामीणों में आज भी प्रबल है।


ग्यारहवां पड़ाव – मुंडोली 
फल्दिया से यात्रा कांडे, पिलखड़ा, ल्वाणी और बगड़ी गाड़ होते हुए मुंडोली तक जाती है।

बारहवां पड़ाव वान -मुंडोली से यात्रा लोहाजांग होते हुए वान गांव पहुंचती है। यह इस यात्रा का अंतिम गांव है। यहां यात्रा का बड़ा संगम होता है। वान में, कई अन्य डोली और छतोली मुख्य यात्रा में शामिल हो जाती हैं, जैसे कुरुद की दासोली यात्रा , पैंखंडायात्रा ,विरही घाट यात्रा और फरसवाड़  फाट की यात्रा एवं अन्य अनेकों यात्रा शामिल होती है। इस प्रकार इस यात्रा में पूरे उत्तराखंड के सांस्कृतिक स्वरूप के  दर्शन हो जाते हैं ।    

असल में हिमालय की इस यात्रा  का बहाव भी अपनी नदियों की तरह है । अंतर केवल इतना है कि  नदियां नीचे की और बहती है  और यह यात्रा ऊपर की और। गांव -गावं से छतोली, डोली और निशानों के साथ यात्री निकलते हैं और साथ-साथ आगे बढ़ते हैं।  

मान्यता है कि वाण गावं वालों से नंदा ने वचन लिया है  कि  जिस दिन मेरी यात्रा  तुम्हारे गावं में आएगी  उस  दिन तुम्हें  अपने घरों पर ताले नहीं लगाने  होंगें  तथा मेरे साथ यात्रियों  की सेवा करनी होगी।   यहां गांव स्थित मंदिर में उत्सव होता है।  नृत्य किया जाता है और विभिन्न क्षेत्रों  से आये देव   यात्रियों का मिलन  होता है। वान से, यात्रा अनेकों स्थान पार कर बेदिनी बुग्याल पहुंचती है।  

तेरहवां पड़ाव -बेदिनी बुग्याल

पहाड़ों के लुभावने दृश्य प्रस्तुत करने वाले इस बुग्याल के बारे में   कहा  जाता है कि ब्रह्मा ने यहां बैठकर वेदों की रचना की वार्षिक जात  के अवसर पर यहां प्रतिवर्ष  रूपकुंड महोत्सव का आयोजन किया जाता है इस  बुग्याल के बीच स्थित वैतरणी  कुंड में राजजात और वार्षिक जात के अवसर पर पूजा की परम्परा है। 

परम्परा अनुसार वैतरणी  कुंड में राजकुंवर कुनियाल ब्राह्मणों के साथ अपने पूर्वजों के लिए तर्पण करते हैं। 

चौदहवां पड़ाव- पतार नाचोनिया 

वेदनी कुड से यात्री दल पातरनचौंणियां पहुंचते  है। कहते हैं कि इस जगह का नाम पहले निरालीधार था कहा जाता है कि  कन्नौज के राजा जसधवल यात्रा में आए थे । उन्होंने यात्रा की परम्पराओ को ना मानते हुए इस जगह पर नर्तकियो से नाच गाना करवाया । ऐसा विश्वाश  प्रचलित है कि इससे देवी कुपित हुई और उन नर्तकियो को    शिला  यानि पत्थर में बदल दिया  । इसी वजह से इस जगह को पातर नौचानियां कहते हैं । 

पातरनचौंणियां के बाद तेज चढ़ाई पार कर यात्रा कैलवाविनायक पहुंचती है ।यहाँ भगवान गणेश की एक प्राचीन प्रतिमा भी है।
पतार नाचोनिया से लगभग 7 किलोमीटर दूर  बगुवावासा है , जहां लोगों का मानना ​​है कि यहां  मां भगवती का वाहन बगुवा अर्थात  बाघ का निवास है। इसलिए इस इस स्थान का नाम बगुवावासा पड़ा। यहां से यात्रा  चेडिया नाग होते हुए रूपकुंड पहुंचती है। 

15वां पड़ाव रूपकुंड 

यहां पर बड़ी संख्यां में मानव कंकाल दिखते हैं,जिस कारण इसे ‘कंकालों की झील’ कहा जाता। यह नर  कंकाल  इस यात्रा में हुयी दुर्घटनाओं की कहानी बंया  करते हैं। कुंड के बारे में धार्मिक मान्यता है  कि इस झील का निर्माण स्वयं भगवान शिव ने किया था।  इस कुंड के बारे में मान्यता है कि विवाह के बाद शिव और नंदा कैलाश जा रहे थे। नंदा देवी को यहां पर  प्यास लगी । उसने शिवजी  से कहा  तो भगवान शिव ने त्रिशूल मारकर कुंड का निर्माण किया। जव नंदा देवी कुंड से पानी पी रही थी तो कुंड के निर्मल जल में अपना रूप देखा इसलिए इस कुंड का नाम रूपकुंड पड़ा । 

 
ज्यूरा गली धार – रूपकुंड से आगे ज्यूरा गली धार, पूरी यात्रा में सर्वाधिक ऊंचाई  पर स्थित कठिन स्थल है मान्यता है कि यात्रियों को पार कराने में यहां पर वाण का लाटू देवता  सहायता करता है।  

सोलहवां पड़ाव शिलासमुद्र

 इसके बाद आता है शिलासमुद्र इसे होमकुंड पंहुचने का अंतिम पड़ाव भी कहा जा  जाता है।  

अंतिम पड़ाव होमकुंड

 होमकुंड  अर्थात  वह  अंतिम स्थान  जहां पर  इस परम्परागत यात्रा का समापन होता है । जहाँ पर सभी रिवाजो को पूर्ण करने के बाद चौसिंगिया खाडू को छोड़ दिया जाता है, जिसमे सवार माँ नंदा देवी कैलाश पर्वत की और प्रस्थान करती है।
  यहां पर होमकुंड यानि यज्ञ कुंड बना हुआ है। देवी की विदाई का क्षण ये भावनात्मक होता है।    

नंदा देवी राज जात यात्रा का शुभ समय और मुहूर्त

  • बसंत पंचमी को नौटी मंदिर में मुहूर्त तय
  • केवल कंसुवा के कुंवर परिवार को अधिकार
  • कुलसारी गांव में अमावस्या को पहुंचना अनिवार्य
  • देवी की राशि: वृश्चिक
  • नक्षत्र: अनुराधा

नंदा देवी राज जात यात्रा की पौराणिक कथा

नंदा देवी राजजात यात्रा की कहानी में विभिन्न पहलु पिरोए गए हैं,इन विभिन्न पहलुओं में जो सबसे ज्यादा प्रचलित है उसके अनुसार कहा जाता है कि मां नंदा देवी कोई और नहीं बल्कि स्वयं देवी पार्वती हैं। जिनका विवाह भगवान शिव से संपन्न हुआ। विवाह पश्चात माँ नंदा शिव के साथ अपने ससुराल यानि कैलाश पर्वत चली गई। कई वर्षो तक वहाँ रहने के पश्चात एक दिन उन्हें अपने घर की याद आई तो उन्होंने भगवान शिव से अपने मायके जाने की इच्छा जताई। अनुमति देते हुए भगवान शिव ने कहा की 12 दिन बाद वह अपने दूत को तुम्हे वापस लेने भेजेंगे।

चूंकि यह सत्युगा युग की एक किंवदंती है, इसलिए उस समय का एक दिन कलयुग में एक वर्ष के बराबर था। इस प्रकार, मां नंदा देवी 12 दिनों तक अपने पैतृक घर में रहीं, जो कलयुग में 12 साल के बराबर हो गई। यही कारण है कि, हर 12 साल में, एक भव्य तीर्थयात्रा प्रतीकात्मक रूप से देवी को अपने पति के घर वापस भेजने के लिए आयोजित की जाती है।

मायके में 12 दिन पूर्ण होने के बाद भगवान शिव ने अपने प्रिय चौसिंगिया खाडू को माँ नंदा को वापस लाने भेजा। माँ नंदा को ससुराल भेजने के लिए सभी तयारी हो चुकी थी और चौसिंघ्या खाडू भी माँ नंदा को लेने पधार चुके थे।

विदाई यात्रा के दौरान माँ नंदा के स्वजन भी उनके साथ जुड़ गए, इस दौरान उनसे बिछड़ने के गम के चलते सभी की आँखे नम थी। कुछ ही दूरी पर चलने के पश्चात वर पक्ष से माँ नंदा को लेने आए, जिसमे सबसे आगे भगवान शिव के चौसिंघीया खाडू थे। मार्ग में जिस स्थान पर माँ नंदा ने अपना पड़ाव डाला था उन सभी स्थानों पर आज माँ नंदा के शक्ति मंदिर स्थापित है। इसी मान्यता के चलते प्रत्येक 12 वर्षो में माँ नंदा देवी राज जात यात्रा के द्वारा माँ नंदा देवी को उनके ससुराल भेजा जाता है। 

नंदा देवी राज जात यात्रा शास्त्रीय/शास्त्रीय कथा इसका उल्लेख हरिवंश पुराण और श्रीमद् भागवत पुराण में किया गया है। इन ग्रंथों के अनुसार, नंदा देवी का जन्म नंद और यासोदा (कृष्ण के पालक माता-पिता) से हुआ था। जब कंस ने देवकी (कृष्ण की जैविक मां) के आठवें बच्चे को मारने का प्रयास किया, तो  वासुदेव और नंद ने अपने  बच्चों को स्थानांतरित किया । जब कंस ने देवकी के  साथ देख बच्चे को मारने की कोशिश की, तो वह उसके  हाथों से फिसल गई और हिमालय में मेरू पर्वत पर चढ़ गई। यहां, वह पहाड़ की देवी नंदा देवी बन गई। चूंकि वह  नंद की बेटी  थी  तो  इसलिए   नंदा कहलायी। 

नंदा देवी राज जात यात्रा कितने वर्षों में होती है?

हर 12 वर्षों में।

चौसिंघ्या खाडू क्या है?

चार सींगों वाला दुर्लभ भेड़ जो यात्रा का नेतृत्व करता है।

यात्रा कहां समाप्त होती है?

होमकुंड में।

रूपकुंड को कंकालों की झील क्यों कहते हैं?

यहां बड़ी संख्या में मानव कंकाल पाए गए हैं।

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